पिछले ब्लॉग में मैंने प्रकृति के तीन गुणों के बारे में लिखा था !
https://abhishek0708.blogspot.com/2020/07/a-deep-question.html
लेकिन पढ़ने वाले में से किसी एक ने मेरे से एक सवाल पूछ डाला कि अगर ,तीनों गुणों से चलने वाली दुनियाँ ईश्वर ने बनायीं हैं , तो उसमें तमस गुण देने के पीछे ईश्वर का क्या उद्देश्य (aim) है ?
अगर मेरे शब्दों से समझें तो ईश्वर का कोई उद्देश्य नहीं है और वह पूरी तरह से उद्देश्यविहीन (aimless) होता है ! उद्देश्य तो जीव के लिए है जिसके सामने भविष्य में कोई लक्ष्य हो ! जैसे समझें कोई दर्ज़ी है और वह कपड़े सीने का काम सीखता है ! क्योंकि उसे भविष्य में लोगों के कपड़े सिलकर पैसे कमाने है या उसे कम से कम अपनी आजीविका ही चलानी है !
तो उसे उस काम में मज़ा नहीं भी आती फिर भी वो सीखेगा, क्योंकि एक बात तो सही है लक्ष्य को पाने के लिए किया हुआ कर्म कभी सुखदायी नहीं होता ! और हमें उसे पूरा करते वक़्त उतार -चढ़ाव से भी गुज़रना पड़ता हैं !
दूसरा अगर मेरा कोई अपना शौक है ऐसी चीज जिसे करने में मुझे सुख मिलता है और भले ही उसके लिए मुझे कोई पैसे न भी मिले तो भी मैं उसे बिना किसी दबाव के करूँगा ! और भले भी मुझे उल्टा कुछ पैसे उसके लिए देने ही क्यों न पड़े तो भी मैं बिना किसी झंझट के पैसे दे दूँगा !
उदहारण के लिए किसी छोटे बच्चे को क्रिकेट या कोई भी खेल के कोई उसे पैसे नहीं देता वो तो बस उसे खेलता है ! हम लोगों ने भी खेला है तो उस खेल में हमने कोई लक्ष्य ढूंढा ? , उल्टा बॉल ख़रीदने के पैसे उसमें अलग से लगा दिए ! अगर हमसे कोई पूछे कि ये जो तुम खेल रहे हो उसके पीछे तुम्हारा कोई उद्देश्य है ?... हमारा ज़वाब यहीं होगा कि " भैया खेलने में मज़ा आती है अब इसमें भी तुम्हें कोई दिक़्क़त हो तो बताओ "! असल में केवल खेल लेना ही आनंद है !
परमात्मा किसी उद्देश्य से जगत को नहीं बना रहा है ! बना लेने में ही आनंद है बस !!! , आगे पीछे कोई उद्देश्य नहीं बिलकुल purposeless ! और ध्यान रहे... आनंद हमेशा ही उद्देश्यविहीन ( purposeless) होता है !एक माँ अपने बेटे को बड़ा कर रही है और उसे दुलारती है , उससे पूछें कि इसे बड़ा करने के पीछे तुम्हारा क्या उद्देश्य है ? अगर वो कहती हैं कि इसलिए कि बेटा बड़ा हो कर उसके लिए ये करेगा , वो करेगा !
!तो फिर वो माँ नहीं है , वो एक factory है ! जो कि एक प्रोडक्ट को तैयार कर रही है, ताकि बनने के बाद बाज़ार में इसका अच्छा भाव मिले और मेरा फ़ायदा हो ! लेकिन माँ ऐसा जवाब नहीं देती, वो कहती है कैसा बेवकूफों वाला सवाल पूछते हो , मुझे नहीं पता बस !! अपने बेटे को प्यार करने में मुझे खुशी मिलती है ! और उस आनन्द या खुशी के आगे उद्देश्य जैसे विकल्प का भला क्या काम !
बस समझ ले ईश्वर ने जीवन इसीलिए बनाया क्योंकि उसके बना लेने में ही आनंद है !
हाँ , लेकिन ये बात तर्कसंगत है कि उसने तमस क्यों बनाया ? बात ये कि हमने तमस शब्द को ही शुरू से गलत समझा ! लेकिन अगर आप समझे तो ज़हर भी एक तामसिक तत्त्व में ही आता है , पर फिर भी कई बीमारियों के इलाज़ दवा में किसी न किसी ज़हर का भी इस्तेमाल होता है ! समस्या ये है किसी भी तत्त्व की अति ( overdose or overload ) गलत है ! ज़हर की बात छोड़े, आप अगर ख़ीर या कोई फायदा करने वाली चीज ज्यादा मात्रा में खा ले तो भी आप बीमार पड़ जायेगे !
बिना तमस के तो दुनियाँ अपने अस्तित्व में हो ही नहीं सकती ! और उसके विपरीत में उसे रोकने के लिए रजस का अस्तित्व भी जरूरी है ! लेकिन केवल रजस कि ओर भी मुड़ जाये तो भी ख़तरा हो जायेगा ! जीवन एक नियम है और उसका मतलब ये कि कोई नियम भला नहीं और कोई बुरा नहीं ! सब अनिवार्य तत्त्व है ! और श्रेष्ठम जीवन वो है जहाँ ये तीनो गुण ( सत्व , रजस और तमस ) संतुलन की अवस्था में हो ! उसी पल इंसान इन तीनो गुणों के बाहर निकल जाता है परमात्मा को अनुभव कर लेता है !
आपने देखा होगा नट को , जो दो बांसो में बंधे रस्सी पर चलता है और उसके हाथ में डंडा होता है ! वो रस्सी पर संतुलन करता है और अगर वो दाई तरफ झुके तो इस भरम में न पड़े कि वो गिर जायेगा ! वो दायी तरफ झुका ही इसलिए क्योंकि कि बाएं और गिरने का डर था ! और फिर बाएं भी झुक रहा है क्योंकि दाये गिरने वाला है ! वो हर पल बैलेंस कर रहा है , और प्रकृति नीचे अपना काम कर रही है ! नट अगर संतुलन न करे तो वो ज़मीन पर गिर जायेगा और हड्डी पसली तुड़वा बैठेगा ! फिर प्रकृति से वह ये नहीं कह सकता ही तूने मुझे गिरा दिया ! प्रकृति कहेगी तुम अपनी रस्सी पर संतुलन किये रहो ,मुझे फिर कोई मतलब नहीं ! और अगर संतुलन न कर पाए तब तो नीचे मैं अपना नियतांक कर्म कर रही हूँ , तुम उसी के हिसाब से नीचे गिरोगे और इसमें मेरा कोई दोष भी नहीं अगर तुम बैलेंस न कर पाए !
भगवान श्री कृष्ण का योग एक "समता योग " ( The Yog of Balance) है ! नट के तरह जीवन हर पल एक संतुलन है !
ज्यादा खा लिया तो उपवास करो , या ज्यादा उपवास कर लिया तो कुछ खा लो ! जीवन एक बहुत ही बारीक़ संतुलन है , उसमे जरा यहाँ- वहाँ चूके कि आप उसी पल नीचे की ओर गिर गए !
मतलब ये है कि इंसान तमस के द्वारा रजस को साधता रहे और जब रजस बढ़े तो तमस की ओर झुक जाये ! दोनों को साधता (focused) रहे ! और जब ये दोनों सध जाते है तो इंसान की सीधी यात्रा सत्व की और बढ़ती है ! अब इन तीनो ( सत्व , रजस और तमस ) सध गए ! असल दो के बीच साध लेना आसान है और जिसने दो को साधा वो होता साधु ! जिसने तीनो को साध गया वो संत होता है ! और जब तीनो के बीच कोई साध लेता तो वह इन तीनो के बीच जो केंद्र है वहां पहुँच जाता है ,और वो प्रकृति के तीनो गुणों के बाहर निकल जाता है !
जो एक खाली जगह है और वहां सब कुछ शून्य है ! और केंद्र की वह खाली जगह इन तीनो शक्तियों की बीच का द्वार है ! वही जगह, जहां से व्यक्ति परमात्मा , ब्रह्म या चैतन्य में प्रवेश कर जाता है ! इसीलिए भगवान श्री कृष्ण को चैतन्य कहा गया है !
कुल मिलाकर ये निष्कर्ष निकलता है कि प्रकृति है त्रिगुणा… और परमात्मा है त्रिगुणा तीर्थ !!!
https://abhishek0708.blogspot.com/2020/07/a-deep-question.html
लेकिन पढ़ने वाले में से किसी एक ने मेरे से एक सवाल पूछ डाला कि अगर ,तीनों गुणों से चलने वाली दुनियाँ ईश्वर ने बनायीं हैं , तो उसमें तमस गुण देने के पीछे ईश्वर का क्या उद्देश्य (aim) है ?
अगर मेरे शब्दों से समझें तो ईश्वर का कोई उद्देश्य नहीं है और वह पूरी तरह से उद्देश्यविहीन (aimless) होता है ! उद्देश्य तो जीव के लिए है जिसके सामने भविष्य में कोई लक्ष्य हो ! जैसे समझें कोई दर्ज़ी है और वह कपड़े सीने का काम सीखता है ! क्योंकि उसे भविष्य में लोगों के कपड़े सिलकर पैसे कमाने है या उसे कम से कम अपनी आजीविका ही चलानी है !
तो उसे उस काम में मज़ा नहीं भी आती फिर भी वो सीखेगा, क्योंकि एक बात तो सही है लक्ष्य को पाने के लिए किया हुआ कर्म कभी सुखदायी नहीं होता ! और हमें उसे पूरा करते वक़्त उतार -चढ़ाव से भी गुज़रना पड़ता हैं !
दूसरा अगर मेरा कोई अपना शौक है ऐसी चीज जिसे करने में मुझे सुख मिलता है और भले ही उसके लिए मुझे कोई पैसे न भी मिले तो भी मैं उसे बिना किसी दबाव के करूँगा ! और भले भी मुझे उल्टा कुछ पैसे उसके लिए देने ही क्यों न पड़े तो भी मैं बिना किसी झंझट के पैसे दे दूँगा !
उदहारण के लिए किसी छोटे बच्चे को क्रिकेट या कोई भी खेल के कोई उसे पैसे नहीं देता वो तो बस उसे खेलता है ! हम लोगों ने भी खेला है तो उस खेल में हमने कोई लक्ष्य ढूंढा ? , उल्टा बॉल ख़रीदने के पैसे उसमें अलग से लगा दिए ! अगर हमसे कोई पूछे कि ये जो तुम खेल रहे हो उसके पीछे तुम्हारा कोई उद्देश्य है ?... हमारा ज़वाब यहीं होगा कि " भैया खेलने में मज़ा आती है अब इसमें भी तुम्हें कोई दिक़्क़त हो तो बताओ "! असल में केवल खेल लेना ही आनंद है !
परमात्मा किसी उद्देश्य से जगत को नहीं बना रहा है ! बना लेने में ही आनंद है बस !!! , आगे पीछे कोई उद्देश्य नहीं बिलकुल purposeless ! और ध्यान रहे... आनंद हमेशा ही उद्देश्यविहीन ( purposeless) होता है !एक माँ अपने बेटे को बड़ा कर रही है और उसे दुलारती है , उससे पूछें कि इसे बड़ा करने के पीछे तुम्हारा क्या उद्देश्य है ? अगर वो कहती हैं कि इसलिए कि बेटा बड़ा हो कर उसके लिए ये करेगा , वो करेगा !
!तो फिर वो माँ नहीं है , वो एक factory है ! जो कि एक प्रोडक्ट को तैयार कर रही है, ताकि बनने के बाद बाज़ार में इसका अच्छा भाव मिले और मेरा फ़ायदा हो ! लेकिन माँ ऐसा जवाब नहीं देती, वो कहती है कैसा बेवकूफों वाला सवाल पूछते हो , मुझे नहीं पता बस !! अपने बेटे को प्यार करने में मुझे खुशी मिलती है ! और उस आनन्द या खुशी के आगे उद्देश्य जैसे विकल्प का भला क्या काम !
बस समझ ले ईश्वर ने जीवन इसीलिए बनाया क्योंकि उसके बना लेने में ही आनंद है !
हाँ , लेकिन ये बात तर्कसंगत है कि उसने तमस क्यों बनाया ? बात ये कि हमने तमस शब्द को ही शुरू से गलत समझा ! लेकिन अगर आप समझे तो ज़हर भी एक तामसिक तत्त्व में ही आता है , पर फिर भी कई बीमारियों के इलाज़ दवा में किसी न किसी ज़हर का भी इस्तेमाल होता है ! समस्या ये है किसी भी तत्त्व की अति ( overdose or overload ) गलत है ! ज़हर की बात छोड़े, आप अगर ख़ीर या कोई फायदा करने वाली चीज ज्यादा मात्रा में खा ले तो भी आप बीमार पड़ जायेगे !
बिना तमस के तो दुनियाँ अपने अस्तित्व में हो ही नहीं सकती ! और उसके विपरीत में उसे रोकने के लिए रजस का अस्तित्व भी जरूरी है ! लेकिन केवल रजस कि ओर भी मुड़ जाये तो भी ख़तरा हो जायेगा ! जीवन एक नियम है और उसका मतलब ये कि कोई नियम भला नहीं और कोई बुरा नहीं ! सब अनिवार्य तत्त्व है ! और श्रेष्ठम जीवन वो है जहाँ ये तीनो गुण ( सत्व , रजस और तमस ) संतुलन की अवस्था में हो ! उसी पल इंसान इन तीनो गुणों के बाहर निकल जाता है परमात्मा को अनुभव कर लेता है !
आपने देखा होगा नट को , जो दो बांसो में बंधे रस्सी पर चलता है और उसके हाथ में डंडा होता है ! वो रस्सी पर संतुलन करता है और अगर वो दाई तरफ झुके तो इस भरम में न पड़े कि वो गिर जायेगा ! वो दायी तरफ झुका ही इसलिए क्योंकि कि बाएं और गिरने का डर था ! और फिर बाएं भी झुक रहा है क्योंकि दाये गिरने वाला है ! वो हर पल बैलेंस कर रहा है , और प्रकृति नीचे अपना काम कर रही है ! नट अगर संतुलन न करे तो वो ज़मीन पर गिर जायेगा और हड्डी पसली तुड़वा बैठेगा ! फिर प्रकृति से वह ये नहीं कह सकता ही तूने मुझे गिरा दिया ! प्रकृति कहेगी तुम अपनी रस्सी पर संतुलन किये रहो ,मुझे फिर कोई मतलब नहीं ! और अगर संतुलन न कर पाए तब तो नीचे मैं अपना नियतांक कर्म कर रही हूँ , तुम उसी के हिसाब से नीचे गिरोगे और इसमें मेरा कोई दोष भी नहीं अगर तुम बैलेंस न कर पाए !
भगवान श्री कृष्ण का योग एक "समता योग " ( The Yog of Balance) है ! नट के तरह जीवन हर पल एक संतुलन है !
ज्यादा खा लिया तो उपवास करो , या ज्यादा उपवास कर लिया तो कुछ खा लो ! जीवन एक बहुत ही बारीक़ संतुलन है , उसमे जरा यहाँ- वहाँ चूके कि आप उसी पल नीचे की ओर गिर गए !
मतलब ये है कि इंसान तमस के द्वारा रजस को साधता रहे और जब रजस बढ़े तो तमस की ओर झुक जाये ! दोनों को साधता (focused) रहे ! और जब ये दोनों सध जाते है तो इंसान की सीधी यात्रा सत्व की और बढ़ती है ! अब इन तीनो ( सत्व , रजस और तमस ) सध गए ! असल दो के बीच साध लेना आसान है और जिसने दो को साधा वो होता साधु ! जिसने तीनो को साध गया वो संत होता है ! और जब तीनो के बीच कोई साध लेता तो वह इन तीनो के बीच जो केंद्र है वहां पहुँच जाता है ,और वो प्रकृति के तीनो गुणों के बाहर निकल जाता है !
जो एक खाली जगह है और वहां सब कुछ शून्य है ! और केंद्र की वह खाली जगह इन तीनो शक्तियों की बीच का द्वार है ! वही जगह, जहां से व्यक्ति परमात्मा , ब्रह्म या चैतन्य में प्रवेश कर जाता है ! इसीलिए भगवान श्री कृष्ण को चैतन्य कहा गया है !
कुल मिलाकर ये निष्कर्ष निकलता है कि प्रकृति है त्रिगुणा… और परमात्मा है त्रिगुणा तीर्थ !!!







You have a high classed writing skill. Hats of you.
ReplyDeleteThanq 😊
DeleteYour deep thoughts gives INTRINSIC MOTIVATION.
ReplyDeleteThanq..Monster
DeleteLovely ""A Finely Balance"" blog
ReplyDeleteThought is-
"""Inetrest is Interest""
##Passion is not Bought with Money.##
right yaar.. you always catched the concept of my thoughts.
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