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Our Suppressed Emotions.((हमारी दबी भावनाएं) !!

सभ्यता (well mannered or civilized) ने बहुत दिक्कत पैदा कर दी हैं ! एक असभ्य या जंगली इंसान का दिमाग हमसे कही अधिक शुद्ध है या उसके में ज़्यादा कुछ राग-लपेट नहीं होता है ! एक असभ्य इंसान में  पुरानी दबी भावनाएं उस मात्रा में नहीं होती जितनी कि एक सभ्य व्यक्ति में होती है !
हम सभी सभ्य है, क्योंकि हमने अपने अधिकतर  ( भावनाओं का प्रवाह ) को कही न कही दिमाग के कोने में दबा रखा है ! समझ लीजिये कि आप किसी दफ्तर में है और मालिक ने कुछ उल्टा सीधा कहा ! आपको गुस्सा तो आया लेकिन आप उसके सामने अपने दांत नहीं  किटकिटा सकते और न ही अपनी हाथो से उसे मार सकते है ! लेकिन अब जो गुस्से के रूप में एक नकारात्मक शक्ति पैदा हो गई है , उसका क्या होगा ? 

कोई भी शक्ति या ऊर्जा कभी नष्ट नहीं होती , ऐसा मैं नहीं, विज्ञान भी कहता है ! हाँ वो दूसरे रूप में बदली जा सकती है ! आपको अगर किसी ने कुछ गलत बोला तो आप में से अधिकांश  एक सभ्य होने के नाते न ही उस पर चिल्ला सकें  , न अपना ही घूसा दीवार पर मार सके , सारा सामान यहाँ वहाँ भी नहीं  फेंक पाए  !आपने अपने गुस्से को दबा लिया और अब वही नकारात्मक ऊर्जा आपके अंदर शरीर की किसी भी कोशिका को विकृत करने का काम करेगी ! क्योंकि वो दब गयी और उसे बाहर निकलने का रास्ता न मिला , और न ही उसे किसी दूसरे  रूप में  बदला गया !

सभ्यता के ढोंग में हम सभी ने ऐसी न जाने कितनी भावावेश को दिमाग के अंदर एक मन के रूप में दबा के रखा है ! दिमाग एक मांस का मज्जा है और  मन और कुछ नहीं आप के ही द्वारा उस मस्तिष्क के मज्जे में विचारों  की एक प्रोग्रामिंग है ! क्या आपने कभी ख्याल किया है, कि आपने अकेले एक कमरे में शीशे के सामने खुद देख कर एक अजीबो गरीब मुँह बनाया है , या मुस्कुराया है , या फिर गुस्से में ही खुद को देखा है ? बाथरूम में नहाते वक़्त गाना गाने लग जाना या जोर से सीटी बजाना ? 
अगर कोई इसका जवाब नहीं में देता है तो वो खुद से ही एक झूठ बोल रहा है , क्योंकि वो ऐसा कई बार कर चुका है !

अगर मैं कहूँ कि आप एक दिन के लिए अकेले  एक कमरे में बंद हो जाए और आपको कोई भी न देख रहा हो ? तो आप का शरीर उस कमरे में शायद नाचे , गाये , उछले-कूदे या किसी काल्पनिक दुश्मन को मारे ! या और भी कुछ !  आप कुछ भी न  करे, बस अपने शरीर की गतिविधियों पर ध्यान दें ! आप सोच में पड़ जायेगे की आप ये क्या कर रहे है और ये क्यों हो रहा है ? लेकिन आधे घंटे की इस उछल -कूद के बाद आप के अंदर चिढ़चिड़ापन और सारी मानसिक उत्तेजना खत्म हो जाएगी ! आप शांत और सुरक्षित महसूस करेंगे और आप हैरान होंगे कि ये आखिर हो कैसे गया !
आपको जब किसी उलझने या लड़ने का मन करता है तो उसके पीछे भी इन्ही पुरानी भावनाओं का ही साथ होता हैं ! आपको पता होगा  पिछले दो विश्वयुद्ध हुए ! लेकिन इन दो विश्व युद्धों के बाद कुछ अजीब सा हुआ जो शायद आपको पता भी नहीं होगा कि उस दौरान आत्महत्या की घटनाएं एकदम से कम हो गयी थी ! मनोवैज्ञानिक बहुत हैरान हुए कि आत्महत्या का स्तर कैसे घट गया और उन दिनों किसी का मर्डर भी नहीं हुआ ! और सबसे बड़ी बात...  मानसिक बीमारों की संख्या बिलकुल न के बराबर हो गयी और पागलखानों में नए पागलों की भर्ती नहीं हुई ! अंततः निष्कर्ष ये निकलता है कि जब किसी भी युद्ध या ऐसी कोई आवेश वाली खबरे पढ़ते है या देखते तो आप भी उसमें भावनात्मक रूप से जुड़ जाते है !

समझ लीजिए आप गुस्से में आ गए है और किसी भ्रस्ट नेता का पुतला फूकते है या ऐसी कोई न्यूज़ भी देखते है तो भी आप टीवी पर बैठ कर उसे गाली देते है या जब हीरो किसी विलन को किसी मूवी में घुसे मार रहा होता है तो आप हीरो को चीयर अप करते  है कि मार..उसे और मार ! इसका परिणाम ये होता है कि उस दौरान आप जाने अनजाने में अपने उस पुराने भावनाओं को दिमाग से  निकाल के बाहर कर रहे है।, जिसे हम खुन्नस भी कहते है ! और आपको एक मानसिक स्वास्थ्य मिल रहा है  !
असल में ये सारी भावनाओं के रूप में दिमाग में जमी हुई ऊर्जा है जो किसी की डांट , गाली , गुस्सा, वासना, घृणा ,ईर्ष्या   तिरस्कार या अधिक खुशी को छुपा लेने से हुई ! जिसे आप लोगो के सामने व्यक्त न कर पाए और जो बाहर निकलना चाह रही थी , लेकिन समाज के बनाये हुए सभ्य कानून उसे आपसे बाहर निकलने नहीं देते और तो और आप भी उसे समाज के सामने निकालना भी नहीं चाहते ! जो किसी हद तक मैं सही भी मानता हूँ , क्योंकि सभ्यता के ही ढांचे पर हमारा समाज खड़ा है ! 

लेकिन आपको एकांत में खुद को जानने और समझने का पूरा अधिकार है !

(Be Reader)

Written By 

Abhishek (AB)

on

15-July20

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