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स्त्री रहस्य ( The Feminine Mystery )

 पुरुष को स्त्री कभी समझ में नहीं आती और शायद इसीलिए पुरुष हमेशा यही समझता है कि स्त्री बेबूझ (not understandable) है ! पुरुष उस स्त्री से जन्म लेता है , रिश्ते निभाता है और निश्चित ही वे साथ-साथ जीते है ! लेकिन फिर भी  वो उसे पूरा समझ नहीं पाता और ऐसा क्या है जो स्त्री जाति के मामले में छूट रहा है ? भला वो समझ में क्यों नहीं आती ? इसी को The feminine mystery ( स्त्री रहस्य ) कहते है ! इसे निषेध ( prohibited या पाबन्दी ) की शक्ति भी कहा गया है ! अगर एक स्त्री किसी पुरुष के  प्यार में भी पड़ जाये तो भी पहल या आक्रमण नहीं करती , वो प्रेम में प्रतीक्षा करती है ! पहल का मौका पुरुष को  ही देती है ! हम किसी स्त्री से ऐसा न कह सकेंगे कि तूने मुझे प्यार में उलझा दिया और मै कहता हूँ स्त्रियाँ ही उलझाती है ! लेकिन आप स्त्री पर दोष नहीं डाल सकते क्योंकि वे कभी पहल नहीं करती , और वही उनका रहस्य है खींचना...और वो भी बिना किसी क्रिया के ! सिर्फ और सिर्फ होने मात्रा से ही आकर्षित कर लेना ! वो अगर आपके प्रेम में  गिर भी जाये तो भी उसकी ओर से इशारा नहीं होगा कि वो...
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Your Precious Gems (तुम्हारी सर्वोत्तम कृति) !!

बैंग्लोर के डोमलूर इलाक़े में एक बूढ़ा मजदूर रहता था ! बूढ़े ने अपनी जवानी और बुढ़ापे का अधिकांश हिस्सा ग़रीबी में बिता दिया !  कुछ सालों बाद बैंगलोर सरकार को भनक लगी कि ये बूढ़ा जिस जमीन पर अपनी झुग्गी बना कर रहता है , वहाँ पर सोने के एक बड़ी खाद्यान है ! भूगर्भ विश्लेषणों के बाद, उस ज़मीन की खुदाई में भारी मात्रा में सोने के अयस्क बरामद हुए ! और उन अयस्कों से करीब -करीब 185 किलो का सोना मिला ! सरकार ने बूढ़े को जमीन से हटाकर एक नए बंगले में शिफ्ट किया और कुछ किलो सोना उस बूढ़े को भी दिया ! बूढ़े के जीवन गति में बदलाव आया ! शुरू से ही उसे अच्छा पहनने और दिखने का शौक था ! उसने जो काम पहले किया कि उसने अपने लिए एक बड़ी कैडिलेक टूरिंग कार ख़रीदी ! उन दिनों टूरिंग कार के पीछे दो अतिरिक्त टायर भी लगे होते थे ! बुड्ढा रंगबाज़ था इसलिए उसने उसमे दिखाने के लिए 4 अतिरिक्त  टायर और जोड़ दिए ! उसने लॉन्ग कोट , एक हैट और अपनी वेशभूषा के समान को एक बड़े काले सिगार के साथ पूरा किया ! बूढ़ा मित्रवत (friendly nature) था ! और वह अपनी टूरिंग कार से डोमलूर की उन धूल भरी सड़को पर अपनी कार ...

A Finely Balance (एक बारीक़ संतुलन)!!

 पिछले ब्लॉग में मैंने प्रकृति के तीन गुणों के बारे में लिखा था ! https://abhishek0708.blogspot.com/2020/07/a-deep-question.html लेकिन पढ़ने वाले में से किसी एक ने मेरे से एक सवाल पूछ डाला कि अगर ,तीनों गुणों से चलने वाली दुनियाँ ईश्वर ने बनायीं हैं , तो  उसमें तमस गुण देने के पीछे ईश्वर का क्या उद्देश्य (aim) है ? अगर मेरे शब्दों से समझें तो ईश्वर का कोई उद्देश्य नहीं  है और वह पूरी तरह से उद्देश्यविहीन (aimless) होता है ! उद्देश्य तो जीव के लिए है जिसके सामने भविष्य में कोई लक्ष्य हो ! जैसे समझें कोई दर्ज़ी है और वह कपड़े सीने का काम सीखता है ! क्योंकि उसे भविष्य में लोगों के कपड़े  सिलकर पैसे कमाने है या उसे कम से कम अपनी आजीविका ही चलानी है !  तो उसे उस काम में मज़ा नहीं भी आती फिर भी वो सीखेगा, क्योंकि एक बात तो सही है लक्ष्य को पाने के लिए किया हुआ कर्म कभी सुखदायी नहीं होता ! और हमें उसे पूरा करते वक़्त उतार -चढ़ाव से भी गुज़रना पड़ता हैं ! दूसरा अगर मेरा कोई अपना शौक है ऐसी चीज जिसे करने में मुझे सुख मिलता है और भले ही उसके लिए मुझे कोई पैसे न भी...

A Deep Question ( एक गहरा सवाल )

गहरे से गहरा सवाल ये उठा हैं कि ईश्वर ही सबकुछ चला रहा है और हम कहते भी है कि मेरे  सबकुछ चाह लेने  से कुछ नहीं होता ! तो वैसे भी  ईश्वर के ही हाथ में हैं ! हम में से कोई भी ऐसा नहीं  जिसने अपने ज़िन्दगी में कभी कोई गलती नहीं की , या नुकसान नहीं उठाया, और तो और कुछ तो हत्या , चोरी ,या लूटपाट को भी अंजाम दे देते है ! कोई भी गलती , नुकसान या अपराध के परिणाम भुगत लेने के बाद मन में ख्याल जरूर आता है , सच में मैं  ऐसा बिलकुल भी नहीं करना चाहता था ! ये आज जो भी मेरे साथ हुआ इसका उत्तरदायी कौन हैं ? मैं,मेरी किस्मत , परिस्थिति  या फिर वो ईश्वर ?..... बात ये हैं कि अगर मैं कोई ग़लत काम नहीं करना चाहता तो भी तो ऐसी कौन सी दूसरी ऊर्जा हैं जो मुझसे ये बुरे काम जबरदस्ती करा देती हैं ? ईश्वर तो कुछ भी नहीं चाहता क्योंकि चाह लेना ईश्वर का काम नहीं , चाहत  एक जीव  की प्रकृति है , जिसके सामने कोई लक्ष्य खड़ा हो ! ईश्वर तो  स्वयं में ही एक लक्ष्य  होता है , ईश्वर क्यों सोचेगा की हमारा नुकसान हो ! ...

Our Suppressed Emotions.((हमारी दबी भावनाएं) !!

सभ्यता (well mannered or civilized) ने बहुत दिक्कत पैदा कर दी हैं ! एक असभ्य या जंगली इंसान का दिमाग हमसे कही अधिक शुद्ध है या उसके में ज़्यादा कुछ राग-लपेट नहीं होता है ! एक असभ्य इंसान में  पुरानी दबी भावनाएं उस मात्रा में नहीं होती जितनी कि एक सभ्य व्यक्ति में होती है ! हम सभी सभ्य है, क्योंकि हमने अपने अधिकतर  ( भावनाओं का प्रवाह ) को कही न कही दिमाग के कोने में दबा रखा है ! समझ लीजिये कि आप किसी दफ्तर में है और मालिक ने कुछ उल्टा सीधा कहा ! आपको गुस्सा तो आया लेकिन आप उसके सामने अपने दांत नहीं  किटकिटा सकते और न ही अपनी हाथो से उसे मार सकते है ! लेकिन अब जो गुस्से के रूप में एक नकारात्मक शक्ति पैदा हो गई है , उसका क्या होगा ?  कोई भी शक्ति या ऊर्जा कभी नष्ट नहीं होती , ऐसा मैं नहीं, विज्ञान भी कहता है ! हाँ वो दूसरे रूप में बदली जा सकती है ! आपको अगर किसी ने कुछ गलत बोला तो आप में से अधिकांश  एक सभ्य होने के नाते न ही उस पर चिल्ला सकें  , न अपना ही घूसा दीवार पर मार सके , सारा सामान यहाँ वहाँ भी नहीं  फेंक पाए  !आपने अपने गुस्से क...

Rule of A Lame.( एक लंगड़े की बादशाहत)...

इतिहास के पन्नों में एक युद्ध का उल्लेख मिलता है जिसे अंकारा की लड़ाई के नाम से जाना जाता है ! अंकारा की लड़ाई ऐसे दो अपंग ( शरीर के किसी भी अंग से विक्षिप्त ) बादशाहों के बीच में लड़ा गया, जिन्हे मैं किसी डकैत से कम नहीं समझता ! उज्बेकिस्तान और ओटोमन साम्राज्य के बीच ये लड़ाई अपने वर्चस्व को बढ़ाने और बचाने के लिए थी ! Bayezid ( A Ottoman King) 20 जुलाई 1402 िश्वी में ये युद्ध एक डकैत तैमूर लंग और बादशाह बायज़ीद के बीच हुई ! 6 घंटे चले इस युद्ध में तैमूर जंग फतह कर ले गया ! उज्बेकिस्तानी रिवाज़ के अनुसार हारे हुए बंदी बनाए गए सैनिको की गर्दन धड़ से अलग की गई और उन नरमुंड के समूह से करीब 10-15 फिट की एक मीनार बना दी गयी ! ये मीनार उसके झूठे बादशाहत के हस्ताक्षर के तौर पर बनायीं गयी थी ! बायज़ीद का तख्ता पलट हुआ और उसे बंदी बना लिया गया ! हाथों में जंजीर से बांधकर बायज़ीद को तैमूर के सामने लाया गया !  तैमूर अपने सिंघासन पर बैठा और बायज़ीद को देख जोर से हसने लगा ! एक तो बायज़ीद हार गया था और दूसरा उसकी हंसी बायज़ीद को बुरी तरह कचोट रही थी !  उसने गुस्से से तैमूर स...

A foolish fraudstar..( एक बेवकूफ़ ठग )!

साल 1998 ! नागपुर का यह दृश्य एक आस पास के छोटे से सब्ज़ी मंडी का है ! एक 45-48 साल का एक विशिष्ट सा दिखने वाला एक सभ्य व्यक्ति हरी शलजम ख़रीद रहा था ! वह सब्ज़ी विक्रेता को 500 रूपए  का एक नोट देता है और बाकी टूटे पैसे वापस लेने का इंतज़ार करता है ! विक्रेता 500 के  नोट को अपने एक गल्ले में डालता है ! लेकिन ये क्या.. . उसकी उंगलियों पर जो शलज़म उठा कर देने के कारण अभी तक गीली थीं कुछ स्याही सी छूट रही थी ! वह ठिठका और यह सोचने के लिए कि क्या किया जाए, वह थोड़ा रुका ! थोड़ी देर की समस्या से जूझने के बाद , उसने एक निर्णय लिया ! सामने सभ्य सा दिखने वाला व्यक्ति विश्वनाथ सोलंकी ( एक काल्पनिक क़िरदार ) था , बहुत गंभीर लेकिन उतना ही रहस्मयी व्यक्तित्व !    जो कि उस सब्ज़ी विक्रेता का काफी पुराना ग्राहक भी है ! विश्वनाथ बेख़बर अपने सिगरेट से धुंए के ग़ुबार को हवा में फूँक रहा था ! विक्रेता ने सोचा अवश्य ही विश्वनाथ उसे कोई नक़ली नोट नहीं दे सकता, अतः उसने टूटे पैसे विश्वनाथ को दिए और वह चला गया ! उसके जाने के बाद सब्ज़ी विक्रेता को दूसरे विचार आये क...