साल 1998 ! नागपुर का यह दृश्य एक आस पास के छोटे से सब्ज़ी मंडी का है ! एक 45-48 साल का एक विशिष्ट सा दिखने वाला एक सभ्य व्यक्ति हरी शलजम ख़रीद रहा था ! वह सब्ज़ी विक्रेता को 500 रूपए का एक नोट देता है और बाकी टूटे पैसे वापस लेने का इंतज़ार करता है ! विक्रेता 500 के नोट को अपने एक गल्ले में डालता है ! लेकिन ये क्या...उसकी उंगलियों पर जो शलज़म उठा कर देने के कारण अभी तक गीली थीं कुछ स्याही सी छूट रही थी ! वह ठिठका और यह सोचने के लिए कि क्या किया जाए, वह थोड़ा रुका ! थोड़ी देर की समस्या से जूझने के बाद , उसने एक निर्णय लिया ! सामने सभ्य सा दिखने वाला व्यक्ति विश्वनाथ सोलंकी ( एक काल्पनिक क़िरदार ) था , बहुत गंभीर लेकिन उतना ही रहस्मयी व्यक्तित्व !
जो कि उस सब्ज़ी विक्रेता का काफी पुराना ग्राहक भी है ! विश्वनाथ बेख़बर अपने सिगरेट से धुंए के ग़ुबार को हवा में फूँक रहा था ! विक्रेता ने सोचा अवश्य ही विश्वनाथ उसे कोई नक़ली नोट नहीं दे सकता, अतः उसने टूटे पैसे विश्वनाथ को दिए और वह चला गया !
उसके जाने के बाद सब्ज़ी विक्रेता को दूसरे विचार आये क्योंकि भारत में 500 रूपए की कीमत निम्न और मध्यम वर्ग के लोगों के लिए काफी अधिक है ! विक्रेता घर गया और उस 500 रूपए के नोट को पानी से भरे एक बर्तन में डाल दिया ! ये काम भी कोई खतरा उठाने जैसा ही था, क्यूंकि दोनों ही परिस्थिति में उस ग़रीब का ही नुकसान होना था ! महज़ 12 सेकेंड के अंदर पानी में पड़ा हुआ 500 रूपए के नोट का रंग उस पानी के ऊपरी सतह पर आ गया ! और जब उसने पानी से उस नोट को निकालना चाहा, तो वह 500 रूपए का नोट अब केवल एक कोरे कागज़ लोथड़ा ही रह गया ! जिस पर अब कोई भी अंकित चिन्ह या रंग शेष न थे !
अगले दिन उसने ये बात पुलिस को बतायी ! लेकिन उसे विक्रेता की ये बात झूठ लगी , क्योंकि कागज़ की वो लुग्दी में ऐसे कोई साक्ष्य नहीं थे जो साबित कर पाए कि ये कभी 500 रूपए के नोट भी रहे होंगे ! लेकिन उन दिनों न्यूज़ चैनल्स के द्वारा बाजारों में जाली नोटों कि खबरों ने ज़ोर पकड़ रखा था और स्याही छूटने वाली बात ने नागपुर पुलिस को उलझन में डाल कर रख दिया ! अन्ततः उनकी जिज्ञासा और फ़र्ज़ की ज़िम्मेदारी ने उन्हें विश्वनाथ सोलंकी के घर की तलाशी का वॉरंट प्राप्त करने के लिए बाध्य कर दिया !
उसके घर की तलाशी ली गयी ! बेसमेंट में उन्हें 500 रूपए के नकली नोट बनाने की सामग्री मिली ,और कुछ नकली 500 के जाली नोट भी ! जो की किसी असली नोट से भी कही अधिक असली लग रहे थे !
आगे की तलाशी में उन्हें तीन तश्वीरे हाथ लगी जो की विश्वनाथ ने ही अपने हाथों से पेण्ट की थी ! असल में विश्वनाथ एक गज़ब का आर्टिस्ट था और वह उन 500 रूपए की नोटों को अपने हाथ से ही पेन्ट करता था ! बारीक़ी से एक -एक चीज़ में उसने कारीगरी की इतनी दक्षता लगायी थी कि वह हर किसी को बेवकूफ़ बनाता रहा जब तक कि उस सब्ज़ी विक्रेता के गीले हाथों के रूप में भाग्य की विडंबना उसके सामने नहीं आ गयी !
अब विश्वनाथ के माथे से पसीने आने शुरू हुए और उसकी दोनों भौवें आपस में सिकुड़ने लगी क्यूंकि सभी के सामने उसके कारनामों का अस्तित्व जो तार -तार हो रहा था ! सभी से नज़रे चुराते हुए उसने वहाँ से निकलने की योजना बनाई और भागते हुए वो घर की दूसरी मंज़िल पर खिड़की के रास्ते से कूदना चाहा, क्योंकि मुख्य द्वार की ओर भी 2-3 पुलिस कांस्टेबल तैनात थे ! पुलिस पीछा करते हुए दूसरी मंज़िल पर पहुँचती है और उसे चेतावनी देती है लेकिन वो नहीं रुकता ! अंततः उस पर तीन बार गोली चलायी गयी !
शरीर में गोली और आँख में खिड़की के कांच के बुरादे, और अत्यधिक यंत्रणाओं से पीड़ित होते हुए उसने एक व्यक्तत्व दिया कि " मैं इसके बाद यह कभी नहीं करुँगा ! " उसे हिरासत में लिया गया ! कुछ दिन चले इलाज़ में उसकी जान बच गयी ! पूछताछ में पता चला कि उसने अब तक 2 साल में 500 के नकली नोटों से 5 लाख की ठगी कर डाली ! क्योंकि ज़ुर्म संगीन था इसलिए उसे 18 साल की सज़ा हुई !
सज़ा की सुनवाई के बाद, उसकी बनायीं हुई तीन तश्वीरों को नीलामी के लिए रखा गया ! उसकी उंगलियों से उकेरी हुई वो तश्वीरें बिल्कुल जीवंत हो उठती थी ,जैसे वें अभी बोल पड़ेगी ! एक तश्वीर में एक महिला के इर्द -गिर्द दो छोटे बच्चों की रहस्मयी मुस्कान के आगे लेओनार्दो द विंसी की मोनालिसा की मुस्कान भी फ़ीकी पड़ती दिख रही थी ! वह तश्वीर 30 लाख़ में बिकी और बाकी दो तश्वीरें 10-10 लाख ले आस पास !... मतलब कुल 50 लाख़ !
कहानी आगे कहती है कि विश्वनाथ को 500 रूपए की नोट पेण्ट करने में लगभग उतना ही समय लगता था जितना कि 30 लाख़ की बिकी उस तश्वीर को पेण्ट करने में ! हाँ , यह कुशल और प्रतिभाशाली आदमी दुनिया की नज़र में एक चोर था ! अगर उसने विधिसंगत रूप से अपनी योग्यता को बेचा होता तो वह न सिर्फ़ धनवान और लोकप्रिय होता बल्कि वह इस प्रक्रिया में अपने साथियों के लिए भी कितनी ख़ुशी और लाभ लाता !
जैसे तैसे उसने अपने 18 साल की सज़ा काटी ! जब उसे छोड़ा गया तो उसने अपने शब्द (" मैं इसके बाद यह कभी नहीं करुँगा ! ") निभाये ! वह फिर कभी जाली नोटों के ठगी की ज़िन्दगी की ओर वापिस नहीं गया ! सच तो यह है कि वह देहरादून एक छोटे से पहाड़ी इलाक़े में बस गया और आदर्श जीवन जीने लगा !
उसने वहीं के स्थानीय बच्चों को कैनवास पर चित्रकारी की बारीकिया सिखाने में व्यस्त हो गया ! असल में उसने खुद को समर्पित कर दिया था ! आगे उसकी प्रतिभा को देखते हुए कुछ उच्चधिकारियों ने उसे सम्मानित भी किया ! अब देहरादून के बाहरी इलाकों से भी लोग उससे चित्रकारी सीखने आते और अब उसकी प्रतिभा को देहरादून की सीमाएं न बाँध सकीं ! उसकी प्रतिभाओं ने एक तूल सा पकड़ लिया !
आख़िरकार, इस बात का पता चल ही गया कि प्रसिद्ध जाली नोटों का ठग विश्वनाथ सोलंकी उन लोगों के ही बीच में था , जो अब तक श्रीनिवास (बदला हुआ नाम ) बनकर कुछ सालों से देहरादून की उन सकरी गलियों में एक गुमनामी की ज़िन्दगी जी रहा था ! और अब उसकी उम्र 70 साल है ! ये बात जंगल में आग की तरह फ़ैली ! पूरे देश के रिपोर्टर और पत्रकार उस छोटे से पहाड़ी इलाक़े में उसका साक्षात्कार (इंटरव्यू) लेने पहुंचे ! उन्होंने उससे बहुत से सवाल पूछे और अंततः एक नौजवान रिपोर्टर ने सबसे पैने सवाल के साथ यह निर्णायक बात पूछी- " मिस्टर सोलंकी, आपने एक चोर के रूप में अपने जीवन काल में अनेकों बाजारी व्यापारियों को ठगा , लेकिन मैं ये जानने का इक्षुक हूँ कि क्या उनमें से कोई ऐसा व्यक्ति आपको याद है जिसको आपने सबसे अधिक ठगा हो ?.... उसके इस प्रश्न को सुनकर विश्वनाथ के मन अचानक से अतीत के पुरानी परतें फिर से खुलने लगी जिन्हे वो कब का दफ़्न कर चुका था और पुरानी स्मृतियाँ उसकी आँखों के सामने एकाएक गुज़रने लगी ! कुछ पल में ही उसने एक गहरी सांस ली, उसके आँखों से आँसू थे ! रूंधते गले से उसने गंभीर स्वर में बोला- यह तो आसान सवाल है , जिस आदमी को मैनें सबसे अधिक ठगा वह विश्वनाथ सोलंकी यानि मैं खुद था ! मैं अपने पूरे जीवन काल में सबसे अधिक खुद से खुद को ही ठगा ! मैं एक व्यापक तौर पर कला का शिक्षक हो सकता था या देश सबसे प्रसिद्ध चित्रकार ! जिसकी कलाकृति देश के बाहर एक बहुत बड़े स्तर पर विदेशी कलाकृति को चुनौती दे सकती थी ! और मैं अपने समाज में एक अंशदायी सदस्य हो सकता था ! लेकिन इसके बजाय मैनें एक ठग का जीवन चुना, जालसाज़ी करता रहा और अपनी जवानी का दो तिहाई जीवन जेल की सलाखों के पीछे काट दिया !"
हाँ , विश्वनाथ सोलंकी सच में एक ऐसा ठग है जिसने खुद को ही सबसे अधिक ठगा ! इस व्यक्तत्व को सुनकर उस जनसमूह के बीच एक अज़ीब सा सन्नाटा छा गया !
एक ही पल में सवालों झड़ी रूक गई ! शायद इसके बाद पूछने को शेष ही न था और न ही बताने को !
विश्वनाथ की योग्यता एक चित्रकार के रूप में ही थी लेकिन उसने उस योग्यता में एक कपट का ज़हर घोल दिया था ! दरअसल उसे अपनी वास्तविक योग्यता पर विश्वास ही न था ! वह जितना योग्य चित्रकार था उतना अयोग्य ठग ! इस सन्दर्भ में मैं एक दूसरे चोर की बात करना चाहूँगा वह स्पष्ट रूप से आप हैं ! मैं आपको एक चोर कह कर पुकारने वाला हूँ क्योंकि कोई भी व्यक्ति जो अपने आप में विश्वास नहीं रखता और अपनी योग्यता का पूरा उपयोग नहीं करता, वह एक तरह से अपने आप से , अपने प्रियजनों से चुरा रहा है ! और इस प्रक्रिया में अपनी घटी हुई उत्पादकता के कारण वह समाज से चुरा रहा है ! क्योंकि कोई भी जान बूझकर अपने आप से नहीं चुरायेगा , वें यह अनजाने में कर रहें हैं ! तो भी , अपराध अभी भी गंभीर है क्योंकि नुकसान उतना ही बड़ा है जितना कि यह जानबूझकर करने पर होता ! सोचिये ख़ुद से जाने अनजाने में अबतक आप अपनी किस योग्यता को खुद से ही छुपाते आये है ?
उसके बाद जल्दी ही जब आप आईने में देखेंगे तो आप एक पूर्व चोर की आंखों में देख रहे होंगे !
on
उसके जाने के बाद सब्ज़ी विक्रेता को दूसरे विचार आये क्योंकि भारत में 500 रूपए की कीमत निम्न और मध्यम वर्ग के लोगों के लिए काफी अधिक है ! विक्रेता घर गया और उस 500 रूपए के नोट को पानी से भरे एक बर्तन में डाल दिया ! ये काम भी कोई खतरा उठाने जैसा ही था, क्यूंकि दोनों ही परिस्थिति में उस ग़रीब का ही नुकसान होना था ! महज़ 12 सेकेंड के अंदर पानी में पड़ा हुआ 500 रूपए के नोट का रंग उस पानी के ऊपरी सतह पर आ गया ! और जब उसने पानी से उस नोट को निकालना चाहा, तो वह 500 रूपए का नोट अब केवल एक कोरे कागज़ लोथड़ा ही रह गया ! जिस पर अब कोई भी अंकित चिन्ह या रंग शेष न थे !
अगले दिन उसने ये बात पुलिस को बतायी ! लेकिन उसे विक्रेता की ये बात झूठ लगी , क्योंकि कागज़ की वो लुग्दी में ऐसे कोई साक्ष्य नहीं थे जो साबित कर पाए कि ये कभी 500 रूपए के नोट भी रहे होंगे ! लेकिन उन दिनों न्यूज़ चैनल्स के द्वारा बाजारों में जाली नोटों कि खबरों ने ज़ोर पकड़ रखा था और स्याही छूटने वाली बात ने नागपुर पुलिस को उलझन में डाल कर रख दिया ! अन्ततः उनकी जिज्ञासा और फ़र्ज़ की ज़िम्मेदारी ने उन्हें विश्वनाथ सोलंकी के घर की तलाशी का वॉरंट प्राप्त करने के लिए बाध्य कर दिया !
उसके घर की तलाशी ली गयी ! बेसमेंट में उन्हें 500 रूपए के नकली नोट बनाने की सामग्री मिली ,और कुछ नकली 500 के जाली नोट भी ! जो की किसी असली नोट से भी कही अधिक असली लग रहे थे !
आगे की तलाशी में उन्हें तीन तश्वीरे हाथ लगी जो की विश्वनाथ ने ही अपने हाथों से पेण्ट की थी ! असल में विश्वनाथ एक गज़ब का आर्टिस्ट था और वह उन 500 रूपए की नोटों को अपने हाथ से ही पेन्ट करता था ! बारीक़ी से एक -एक चीज़ में उसने कारीगरी की इतनी दक्षता लगायी थी कि वह हर किसी को बेवकूफ़ बनाता रहा जब तक कि उस सब्ज़ी विक्रेता के गीले हाथों के रूप में भाग्य की विडंबना उसके सामने नहीं आ गयी !
अब विश्वनाथ के माथे से पसीने आने शुरू हुए और उसकी दोनों भौवें आपस में सिकुड़ने लगी क्यूंकि सभी के सामने उसके कारनामों का अस्तित्व जो तार -तार हो रहा था ! सभी से नज़रे चुराते हुए उसने वहाँ से निकलने की योजना बनाई और भागते हुए वो घर की दूसरी मंज़िल पर खिड़की के रास्ते से कूदना चाहा, क्योंकि मुख्य द्वार की ओर भी 2-3 पुलिस कांस्टेबल तैनात थे ! पुलिस पीछा करते हुए दूसरी मंज़िल पर पहुँचती है और उसे चेतावनी देती है लेकिन वो नहीं रुकता ! अंततः उस पर तीन बार गोली चलायी गयी !
शरीर में गोली और आँख में खिड़की के कांच के बुरादे, और अत्यधिक यंत्रणाओं से पीड़ित होते हुए उसने एक व्यक्तत्व दिया कि " मैं इसके बाद यह कभी नहीं करुँगा ! " उसे हिरासत में लिया गया ! कुछ दिन चले इलाज़ में उसकी जान बच गयी ! पूछताछ में पता चला कि उसने अब तक 2 साल में 500 के नकली नोटों से 5 लाख की ठगी कर डाली ! क्योंकि ज़ुर्म संगीन था इसलिए उसे 18 साल की सज़ा हुई !
सज़ा की सुनवाई के बाद, उसकी बनायीं हुई तीन तश्वीरों को नीलामी के लिए रखा गया ! उसकी उंगलियों से उकेरी हुई वो तश्वीरें बिल्कुल जीवंत हो उठती थी ,जैसे वें अभी बोल पड़ेगी ! एक तश्वीर में एक महिला के इर्द -गिर्द दो छोटे बच्चों की रहस्मयी मुस्कान के आगे लेओनार्दो द विंसी की मोनालिसा की मुस्कान भी फ़ीकी पड़ती दिख रही थी ! वह तश्वीर 30 लाख़ में बिकी और बाकी दो तश्वीरें 10-10 लाख ले आस पास !... मतलब कुल 50 लाख़ !
कहानी आगे कहती है कि विश्वनाथ को 500 रूपए की नोट पेण्ट करने में लगभग उतना ही समय लगता था जितना कि 30 लाख़ की बिकी उस तश्वीर को पेण्ट करने में ! हाँ , यह कुशल और प्रतिभाशाली आदमी दुनिया की नज़र में एक चोर था ! अगर उसने विधिसंगत रूप से अपनी योग्यता को बेचा होता तो वह न सिर्फ़ धनवान और लोकप्रिय होता बल्कि वह इस प्रक्रिया में अपने साथियों के लिए भी कितनी ख़ुशी और लाभ लाता !
जैसे तैसे उसने अपने 18 साल की सज़ा काटी ! जब उसे छोड़ा गया तो उसने अपने शब्द (" मैं इसके बाद यह कभी नहीं करुँगा ! ") निभाये ! वह फिर कभी जाली नोटों के ठगी की ज़िन्दगी की ओर वापिस नहीं गया ! सच तो यह है कि वह देहरादून एक छोटे से पहाड़ी इलाक़े में बस गया और आदर्श जीवन जीने लगा !
उसने वहीं के स्थानीय बच्चों को कैनवास पर चित्रकारी की बारीकिया सिखाने में व्यस्त हो गया ! असल में उसने खुद को समर्पित कर दिया था ! आगे उसकी प्रतिभा को देखते हुए कुछ उच्चधिकारियों ने उसे सम्मानित भी किया ! अब देहरादून के बाहरी इलाकों से भी लोग उससे चित्रकारी सीखने आते और अब उसकी प्रतिभा को देहरादून की सीमाएं न बाँध सकीं ! उसकी प्रतिभाओं ने एक तूल सा पकड़ लिया !
आख़िरकार, इस बात का पता चल ही गया कि प्रसिद्ध जाली नोटों का ठग विश्वनाथ सोलंकी उन लोगों के ही बीच में था , जो अब तक श्रीनिवास (बदला हुआ नाम ) बनकर कुछ सालों से देहरादून की उन सकरी गलियों में एक गुमनामी की ज़िन्दगी जी रहा था ! और अब उसकी उम्र 70 साल है ! ये बात जंगल में आग की तरह फ़ैली ! पूरे देश के रिपोर्टर और पत्रकार उस छोटे से पहाड़ी इलाक़े में उसका साक्षात्कार (इंटरव्यू) लेने पहुंचे ! उन्होंने उससे बहुत से सवाल पूछे और अंततः एक नौजवान रिपोर्टर ने सबसे पैने सवाल के साथ यह निर्णायक बात पूछी- " मिस्टर सोलंकी, आपने एक चोर के रूप में अपने जीवन काल में अनेकों बाजारी व्यापारियों को ठगा , लेकिन मैं ये जानने का इक्षुक हूँ कि क्या उनमें से कोई ऐसा व्यक्ति आपको याद है जिसको आपने सबसे अधिक ठगा हो ?.... उसके इस प्रश्न को सुनकर विश्वनाथ के मन अचानक से अतीत के पुरानी परतें फिर से खुलने लगी जिन्हे वो कब का दफ़्न कर चुका था और पुरानी स्मृतियाँ उसकी आँखों के सामने एकाएक गुज़रने लगी ! कुछ पल में ही उसने एक गहरी सांस ली, उसके आँखों से आँसू थे ! रूंधते गले से उसने गंभीर स्वर में बोला- यह तो आसान सवाल है , जिस आदमी को मैनें सबसे अधिक ठगा वह विश्वनाथ सोलंकी यानि मैं खुद था ! मैं अपने पूरे जीवन काल में सबसे अधिक खुद से खुद को ही ठगा ! मैं एक व्यापक तौर पर कला का शिक्षक हो सकता था या देश सबसे प्रसिद्ध चित्रकार ! जिसकी कलाकृति देश के बाहर एक बहुत बड़े स्तर पर विदेशी कलाकृति को चुनौती दे सकती थी ! और मैं अपने समाज में एक अंशदायी सदस्य हो सकता था ! लेकिन इसके बजाय मैनें एक ठग का जीवन चुना, जालसाज़ी करता रहा और अपनी जवानी का दो तिहाई जीवन जेल की सलाखों के पीछे काट दिया !"
हाँ , विश्वनाथ सोलंकी सच में एक ऐसा ठग है जिसने खुद को ही सबसे अधिक ठगा ! इस व्यक्तत्व को सुनकर उस जनसमूह के बीच एक अज़ीब सा सन्नाटा छा गया !
एक ही पल में सवालों झड़ी रूक गई ! शायद इसके बाद पूछने को शेष ही न था और न ही बताने को !
विश्वनाथ की योग्यता एक चित्रकार के रूप में ही थी लेकिन उसने उस योग्यता में एक कपट का ज़हर घोल दिया था ! दरअसल उसे अपनी वास्तविक योग्यता पर विश्वास ही न था ! वह जितना योग्य चित्रकार था उतना अयोग्य ठग ! इस सन्दर्भ में मैं एक दूसरे चोर की बात करना चाहूँगा वह स्पष्ट रूप से आप हैं ! मैं आपको एक चोर कह कर पुकारने वाला हूँ क्योंकि कोई भी व्यक्ति जो अपने आप में विश्वास नहीं रखता और अपनी योग्यता का पूरा उपयोग नहीं करता, वह एक तरह से अपने आप से , अपने प्रियजनों से चुरा रहा है ! और इस प्रक्रिया में अपनी घटी हुई उत्पादकता के कारण वह समाज से चुरा रहा है ! क्योंकि कोई भी जान बूझकर अपने आप से नहीं चुरायेगा , वें यह अनजाने में कर रहें हैं ! तो भी , अपराध अभी भी गंभीर है क्योंकि नुकसान उतना ही बड़ा है जितना कि यह जानबूझकर करने पर होता ! सोचिये ख़ुद से जाने अनजाने में अबतक आप अपनी किस योग्यता को खुद से ही छुपाते आये है ?
उसके बाद जल्दी ही जब आप आईने में देखेंगे तो आप एक पूर्व चोर की आंखों में देख रहे होंगे !
Written By
Abhishek Ojha (AB)
on











Nice
ReplyDeleteHeart touching storyAwesome AB
ReplyDeleteI Really enjoyedAwesome AB
ReplyDeleteThank you Monster70
DeleteThank you Proud Indian
ReplyDeleteReally deep story. Keep it up. GBU.
ReplyDeleteThank you. 😊
ReplyDeleteNotice the Story carefully Keywords--
ReplyDelete##Thug Life before Life thug you.##
😊
ReplyDeleteYour writing skill is superb. Keep it on.
ReplyDeletethanx unknown..😊
ReplyDeleteVery nice deep thoughts. Keep it up abhi.
ReplyDeletethank you.
Delete