हमारे जीवन में विचारो का सबसे अधिक महत्व हैं ! विचार हमारे मस्तिष्क में किसी नदी में बहते हुए पानी की तरह है, जिस प्रकार नदी के बहते हुए पानी में हाथ डालने से हर बार एक नया पानी हाथ में आता है , ठीक उसी प्रकार मनुष्य के जीवन में नए विचारो का प्रवाह भी होना जरुरी है ,क्युकि ठहरा हुआ पानी केवल लम्बे बाद ख़राब ही होते और घातक भी! ये मानव मष्तिस्क के विचार ही तो है , जो किसी इंसान को विज्ञान का जनक आइजेक न्युटन बनाता है ! जब सेब के गिरने के तुरंत बाद कुछ पल की चेतना ने उनके अंतर्मन में सेब के नीचे गिरने के कारणों के लिए एक जिज्ञासा उत्पन्न की ! और जिसके फलस्वरूप उन्होंने विज्ञान क्षेत्र में एक नयी क्रांति ला दी! और इन्हीं विचारो का दुष्परिणाम एक सिविल इंजीनियर ओसामा बिन लादेन भी था, जो ना जाने कितने ही निर्दोषो के मौत का जिम्मेदार भी बना !
मानव शरीर में सामान्यतः प्रकृति ने सभी को सामान हड्डी और मांस दिया हुआ है, लेकिन उसके मस्तिष्क में विचारो का प्रवाह सकारात्मक है या नकारात्मक, ये मनुष्य के ऊपर ही निर्भर करता है! क्युकि विचारो से ही आपका आचरण बनता है, और आचरण से आपका स्वभाव,, और स्वभाव ही हमारे जीवन और भविष्य या हमारे भाग्य को निर्धारित करता है! कुछ नकरात्मक छवि के लोग को आपने ये भी कहते सुना होगा कि अब क्या अब तो मेरा समय चला गया या मेरे हाथ से अब सबकुछ निकल चुका! लेकिन ऐसा बिलकुल भी नहीं है ,क्युकि ये पृथ्वी संभावनाओं से भरा एक ग्रह है ! हर पल इसमें कुछ न कुछ घटित होता है, जो एकसाथ कई अवसर को जन्म भी देता है! लेकिन उसके लिए नजरिया भी बहुत जरूरी है कि उसे सकारात्मक रूप में ही होना चाहिए नहीं तो वह अवसर केवल अवसर ही बन कर रह जायेगा !
ऊपर दी हुई बातों को समझाने के लिए मेरे पास कुछ असल ज़िन्दगी में घटित ऐसी कहानियां हैं , जिन्हे आपको समझने में शायद ज्यादा आसानी हो !और उनमें कुछ के परिणाम या नाम आज भी जीवित है !
कुछ महीने पहले मैंने नियाग्रा झील के बारे में सुना! यू ट्यूब पर उसके कुछ वीडियो भी देखे! मुझे लगता है जिसने भी उस झरने को अपने समक्ष देखा होगा शायद उसने हवा में सैकड़ों फुट ऊपर उठती हुई फुहार को देखकर उसकी विशाल प्राकतिक शक्ति को महसूस कर सकता है.!
जब मैंने उस बारे में सोचा तो मेरे मन में विचारो एक श्रृंखला बनी, कि हज़ारो सालों से अनकहा करोड़ो टन का पानी ऊपर उठकर फिर 180 फुट तक गिर कर वस्तुतः अस्तित्व हीनता में बह गया! फिर एक आदमी ने योजना पूर्वक उस विशाल शक्ति के एक हिस्से को काम में लाया! उसने गिरते हुए पानी एक हिस्से को निश्चित लक्ष्य की दिशा दी और उद्योग के पहिये चलाने के लिए करोड़ो किलोवाट घंटे की बिजली पैदा की! हज़ारो घर रोशन हो गए, कई मात्रा में खाद्य पदार्थों का उत्पादन होने लगा और अनेक सामग्रियों का निर्माण और वितरण होने लगा ! शक्ति के इस नए स्रोत्र के फलस्वरूप नौकरियों के नए दरवाज़े खुले, सड़को और अस्पतालों का निर्माण हुआ! लाभों की सूची अनंत है, लेकिन इसका श्रेय सिर्फ एक सोच और विचार को जाता है जिसने प्रकृति के इस विहंगम गिरते हुए पानी में भी अवसर और लाभ की खोज कर ली! अल्बर्ट आइंस्टीन, थॉमस अल्वा ऐडिसन, निकोलस टेस्ला ,जेम्स फोर्ड आदि, इन्ही सोच और विचारो के ही उदाहरण है जो नाम कालांतर तक जीवित रहेंगे !
जब मैंने उस बारे में सोचा तो मेरे मन में विचारो एक श्रृंखला बनी, कि हज़ारो सालों से अनकहा करोड़ो टन का पानी ऊपर उठकर फिर 180 फुट तक गिर कर वस्तुतः अस्तित्व हीनता में बह गया! फिर एक आदमी ने योजना पूर्वक उस विशाल शक्ति के एक हिस्से को काम में लाया! उसने गिरते हुए पानी एक हिस्से को निश्चित लक्ष्य की दिशा दी और उद्योग के पहिये चलाने के लिए करोड़ो किलोवाट घंटे की बिजली पैदा की! हज़ारो घर रोशन हो गए, कई मात्रा में खाद्य पदार्थों का उत्पादन होने लगा और अनेक सामग्रियों का निर्माण और वितरण होने लगा ! शक्ति के इस नए स्रोत्र के फलस्वरूप नौकरियों के नए दरवाज़े खुले, सड़को और अस्पतालों का निर्माण हुआ! लाभों की सूची अनंत है, लेकिन इसका श्रेय सिर्फ एक सोच और विचार को जाता है जिसने प्रकृति के इस विहंगम गिरते हुए पानी में भी अवसर और लाभ की खोज कर ली! अल्बर्ट आइंस्टीन, थॉमस अल्वा ऐडिसन, निकोलस टेस्ला ,जेम्स फोर्ड आदि, इन्ही सोच और विचारो के ही उदाहरण है जो नाम कालांतर तक जीवित रहेंगे !
असल मायने में किसी में चीज में असफल होना असफलता नहीं होती! लेकिन उसे असफलता मान लेना, वास्तव में असफलता होती है! क्युकि मानना मन का ही कार्य है! लेकिन अगर आंतरिक चेतना सकारत्मक है, तब वह मन को कभी नकारत्मक नहीं होने देता ! ये बात फ्रांस एक निडर और बहादुर शासक नेपोलियन बोनापार्ट, जिसे इतिहास में एक महान विजेता और सेनानायक के रूप में लिखा गया है, उस पर बिलकुल सटीक बैठती है !
15 अगस्त 1769 में जन्मे नेपोलियन बोनापार्ट का कहना था की असंभव शब्द केवल मूर्खों के शब्दकोश में आते है! एक समय की बात है ,जब नेपोलियन बोनापार्ट को युद्ध करने के लिए आल्पस की दुर्गम और विशाल पहाड़ियों को पार कर के जाना था ! नेपोलियन के सैनिकों ने आल्पस की ऊंचाई और उसके कठिन रास्तों के बारे में सुना था ! और सबको ये पता था की आल्पस की पहाड़ियों को पार करना लगभग नामुमकिन ही है ! जब नेपोलियन युद्ध के लिए निकला तो उसे रास्ते में एक बुजुर्ग औरत मिली ! जिसने नेपोलियन बोनापार्ट से कहा कि वो अपने सैनिको को ले कर वापस लौट जाये, क्युकि आजतक जिसने भी आल्पस की पहाड़ियों को पार करने की कोशिश की,वो ज़िंदा नहीं लौटा है ! उसके सैनिक ये बात सुनकर और भी ज्यादा डर गए ! लेकिन इस बात पर नेपोलियन पर कोई भी प्रभाव नहीं पड़ा, और वह आंतरिक रूप से स्थिर ही रहा ! उसके सोच में पारदर्शिता थी , जो आर से पार को देखने की कोशिश कर रही थी ! उसने अपना कीमती हीरो का हार उस महिला को भेंट देते हुए कहा की यदि मैं आल्पस की पहाड़ियों को पार करते हुए लौट के आता हूँ तो आप यहाँ नागरिको को ये बात जरूर बताना ! बुजुर्ग औरत उसकी ये बात सुनकर अधिक प्रभावित हुई और उसने नेपोलियन को आशीर्वाद देते हुए कहा - कि वह अपने मक़सद में जरूर कामयाब होगा ! लेकिन सैनिको को कौन समझाता और सैनिकों ने आगे बढ़ने से मना कर दिया ! नेपोलियन सभी को अपने पास बुलाता है, और पूछता है-कि क्या किसी ने भी आल्पस पहाड़ को कभी देखा है ? सभी सैनिक उत्तर देते हुए कहते है- नहीं ! उन्होंने आल्पस पहाड़ को कभी नहीं देखा ! इस पर नेपोलियन कहता है कि ,ठीक है ! तुम सब मेरे साथ आगे बढ़ो और जब आल्पस पहाड़ आएगा, तो मैं तुम लोगों को बता दूँगा !उसके बाद तुम लोग मुझे बता देना कि हम लोगों आगे बढ़ना है या नहीं ! सभी सैनिक आगे की यात्रा को तैयार हो गए ! २-३ दिन की यात्रा के बाद एक विशाल पर्वत उनके सामने आया, तो सैनिको ने नेपोलियन से पूछा कि क्या यही आल्पस पहाड़ है ? नेपोलियन ने कहा- नहीं ! ये आल्पस पहाड़ नहीं है ! ये तो बहुत छोटा पहाड़ है और इसे पार करने के बाद इससे लगभग डेढ़ गुना बड़ा पहाड़ आएगा, वही आल्पस पहाड़ है ! सैनिक उस पहाड़ को पार करते हुए आगे बढ़े और उस पहाड़ को पार करने के बाद आगे वें एक समतल मैदान में पहुंचे ! जहां आगे सिर्फ मैदानी इलाक़ा ही था ! सैनिकों ने दुबारा नेपोलियन से पूछा कि , आल्पस पहाड़ अभी और कितना दूर है ? इस पर नेपोलियन जोर से हँसता है और कहता है कि , किस आल्पस पहाड़ की बात कर रहे हो ! उसे तो हम लोगो ने बहुत पहले ही पार कर लिया है ! नेपोलियन की ये बात सुनकर सभी सैनिक आश्चर्य से भर गए कि उन्होंने कितनी आसानी से उस विशाल पहाड़ को पार कर लिया ! एक नयी चेतना जागृत होने से उनके विचारों ने सकारात्मक करवट ली ! और परिणामश्वरूप सैनिकों का मनोबल और अधिक बढ़ गया ! जिसका नतीजा ये हुआ कि नेपोलियन वो युद्ध भी जीत ले गया !
नेपोलियन से जुड़ी इस घटना के विषय वैसे सभी को ही पता होगा लेकिन बात ये है कि आल्पस पहाड़ के बारे में सैनिकों के पूर्वानुमान और उस बुजुर्ग महिला की बातों का क्या कोई असर नेपोलियन पर नहीं पड़ा ! यदि नेपोलियन उस बुजुर्ग महिला की बात पर विचलित होता तो या तो वह उस अभियान को बीच में ही छोड़ कर लौट जाता या फिर जबरदस्ती सैनिकों से सच बोलकर आल्पस पहाड़ पर चढ़ाई के लिए बोलता ! तो इसका नतीजा क्या होता.... पहले से ही कुछ डरे हुए सैनिको को आल्पस पहाड़ो की चढ़ाई में मृत्यु हो जाती, और जो बचे खुचे सैनिक होते जिनका मनोबल अब पहले से और अधिक टूट चूका है , तो उन सैनिको के साथ मिलकर नेपोलियन का युद्ध जीतना नामुमकिन हो जाता ! लेकिन उसने ऐसा होने नहीं दिया क्युकि उसका लक्ष्य वो आल्पस का पहाड़ नहीं था, उसका लक्ष्य वो युद्ध था, जिसके अभियान पर वो अपने लश्कर के साथ निकला था, और आल्पस पहाड़ तो उसके लिए सिर्फ एक छोटी सी बाधा थी !
इतिहास के पन्नो में बताया गया है कि नेपोलियन कद में थोड़ा छोटा था ! लेकिन ऐसे व्यक्ति की अवचेतना में पहले इतनी सकारत्मक ऊर्जा का विस्तार था कि, उसके मजबूत लक्ष्य विचारों के सामने आल्पस जैसे पहाड़ का अहंकार भी उस अदने कद के समक्ष घुटने टेक देता है !
ऊपर की इस घटना को वर्तमान स्तिथि से जोड़ कर देखें तो पाएंगे कि आज ३० वर्ष के के ऊपर का युवा वर्ग में लगभग सभी का कहना होगा कि उनके लिए कौन सा फैसला सही या गलत ! या कौन सा काम वो कर सकते है और कौन सा नहीं ! अब इसे दूसरी ओर से समझा जाये तो उन्हें तथाकथित इतने वर्षों अनुभव हो चूका हैं ! लेकिन उनमे से कितने प्रतिशत अनुभव मन की कल्पना में रचे गए है और कितने प्रतिशत प्रयोगात्मक है तो इसके जवाब में कल्पनात्मक प्रयोगात्मक से कई गुना अधिक होगा ! सच तो है की उन सभी ने खुद को एक मानसिक सीमाओं के दायरे में बांध रखा है ! दरअसल मन की प्रवृत्ति कल्पना करने की ही होती है और वो बाहरी परिस्तिथि को देखते हुए ही कुछ कल्पनायें करता है, लेकिन वो कल्पनाओं की दिशा सकारत्मक होनी चाहिए या नकारात्मक, ये आपके प्रबल चेतना पर ही निर्भर करता है ! क्युकि चेतना न तो सकारात्मक होती है और न ही नकारत्मक, वो तो केवल होती है ! इसीलिए परिस्तिथि का रूप कैसा भी हो उस विचार को चेतना के माध्यम से सकारत्मकता के साथ अवचेतन रूप में संग्रह करना चाहिए ! असल में मनुष्य का मन जाने अनजाने में कुछ सफलता और असफलता को देखते हुए अपने हर तरफ कुछ सीमाओं एक दीवार बना देता है ! उसके मन ने पहले ही तय किया हुआ कि यहाँ तक रहा तो सही है लेकिन इसके आगे बढ़ा तो खतरा है ! ये खतरा असल में आपके चेतना को नहीं, आपके मन को है ! असल में आप मन नहीं, आप इस हड्डी और मांस के अतिरिक्त स्वयं एक चेतना है !
जरा सोचिये बचपन से अब तक आपने न जाने कितनी ही सीमाओं को अपने इर्द-गिर्द बना रखा है !और उन्हें कैसे पार करना है ,या नहीं करना है उसका निर्णय भी आपके हाथ में ही है !
Written by
Abhishek Ojha
on






Beautiful story and meaningful thoughts
ReplyDeleteReally nice budy
ReplyDeleteInspiring
ReplyDeleteAll red marks thoughts are tremendous.
ReplyDeleteAbsolutely word creation,selection of word given good impression
DeleteInspiring i never ever read like this hats off you
ReplyDeleteNice
ReplyDeleteRead Beautiful story and learned ,
ReplyDelete"""'Great Ambition is the passion of a Great character.""""'
Shabdo me dumm hai.
ReplyDeletethnx to all of u.
ReplyDeleteRegards,
Abhishek (AB)
Great buddy keep it up..
ReplyDeleteReally enjoyedAwesome AB
ReplyDeletethank you bhai
DeleteReally good broAwesome AB
DeleteNice theme bro Awesome AB
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